आज का बाजार टेबलेट से अटा पड़ा है। टेबलेट ना हुआ ताबीज़ हो गया, जेब में कोई भी रकम हो निकालो और ले जाओ, जीवन सफल बनाओ। सफलता की कठिन सीढियों का सबसे बड़ा साथी बनाकर पेश किया जा रहा है इस उत्पाद को। ठीक है ज़माने के साथ हमे बदलना चाहिए यही वक़्त का तकाज़ा है लेकिन जबरन भेडचाल का हिस्सा हो जाना कहाँ तक उचित है। हमारे एक पडोसी जिन्हें बड़ा शौक था के वह नए ज़माने के साथ कदम से कदम मिलाएं, गत सप्ताह ही सुपर मार्केट गए और उठा लाये एक टेबलेट। बाद में पता चला, सेल्समैन ने चतुराई दिखाते हुए उन्हें एक ऐसा प्रोडक्ट थमा दिया था जो दिखने में चकदक था, कीमत भी कम थी पर जिसका न तो प्रोसेसर सही तरह काम कर पा रहा था न टच पैड की प्रतिक्रिया सामान्य थी।
महज दो साल पहले तक हम सिर्फ दवाई वाले टेबलेट को जानते पहचानते थे लेकिन आज PC टेबलेट की मौजूदगी और लोकप्रियता ने इस शब्द को एक नया अर्थ दिया है। आपको जानकार आश्चर्य होगा की एलन काय जैसे दूरदर्शियों ने इस तरह के तकनीक की कल्पना 1972 में ही अपनी किताब Dynabook में कर ली थी। बीसवीं शताब्दी के अंत तक इसके व्यापारिक पहलुओं पर बातें भी शुरू हो चुकी थी।
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एप्पल iPAD 2010 |
दुनिया के अन्य कंपनियों का इस होड़ में शामिल होने में ज्यादा वक़्त नहीं लगा सैमसंग, HTC, मोटोरोला, ब्लैकबेरी, गूगल, ऑसुस, तोशिबा, सोनी इत्यादि जैसे मंजे टेक खिलाडियों ने भी जल्दी ही अपना मोर्चा खोल दिया। किसी ने स्क्रीन का आकर बदला, किसी ने लुक, किसी ने अच्छे ऑफर्स की पेशकाश कर दी। ऐसी मार- काट मची है के मार्च 2012 तक आते-आते अमेरिका के लगभग 40% लोगों के पास अपना टेबलेट था और जिसकी रफ्तार जंगल के आग की तरह फैलती ही जा रही थी या कहिये अभी भी फ़ैल रही है। जीवन सफल बनाने का इससे अच्छा, सुंदर और टिकाऊ तरीका लोगों को मिल नहीं रहा।
इतना सब होने के बावजूद पिछले साल तक भारत जैसे विकासशील देशों को ज्यादा लाभ नहीं हुआ। कीमतें थी की आसमान छू रही थी और आम जनता समाचारों में इसकी कहानियां, समीक्षाएं पढ़कर खुश रहने पर मजबूर थीं। समय का पहिया तब घूमा जब भारत सरकार ने ब्रिटिश कंपनी DataWind के साथ मिलकर आकाश टेबलेट को भारतीय बाज़ारों में पेश करने की बात करी। इसकी कीमतें भी ऐसी चौकाने वाली थी के पूछिये मत। दुसरे टेबलेट्स से कम से कम दस गुणा कम।
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Akash 1 |
भूमिका कुछ ज्यादा नहीं हो गयी? जाने दीजिये, काफी समय से दबा के रखा था, कोई सुनने को तैयार ही नहीं, न कमीने दोस्त न रिश्तेदार! भला हो गूगल का जिसने ब्लागस्पाट जैसे अनूठी तकनीक इजाद की और मै अपनी भड़ास निकाल पाया।
चलिए अब मुद्दे की बात भी कर लेते हैं और समझते हैं के आखिर क्या देखना चाहिए टेबलेट में, खरीदने से पहले:
1. ऑपरेटिंग सिस्टम (OS):
जी हाँ! OS टेबलेट का एक अत्यंत आवश्यक हिस्सा होता और अगर आपने सही चुनाव नहीं किया तो गयी भैंस पानी में। कई सारे पॉपुलर OS अभी बाज़ार में मौजूद हैं जिन्हें अलग- अलग ब्रांड्स से जोड़ा जाता है और इनकी खामियां और खूबियाँ गिनाई जाती है। इनकी जांच परख बहुत आवश्यक है।
- आज भी iOS जो एप्पल अपने iPad में इस्तेमाल करता है सबसे ज्यादा लोकप्रिय है। iOS जो 1 से शुरू हुई थी 6 इसकी सबसे लेटेस्ट पेशकश है।
- 2008 में बाज़ारों में पेश की गयी गूगल एंड्राइड OS की लोकप्रियता दिन दूनी रात चौगुनी बढती जा रही है और वह दिन ज्यादा दूर नहीं जब यह एप्पल को पीछे छोड़ देगी। यह एक लिनक्स बेस्ड OS है जिसे ख़ास तौर से टच स्क्रीन के संयंत्रों के लिए बनाया और डिजाईन किया गया है। यह एक ओपन सोर्स OS होने के कारण इसका मॉडिफिकेशन फ्री होता है। Gingerbread से लोकप्रिय हुआ यह सफ़र आज Jellybean तक पंहुचा है जो इसका लेटेस्ट वर्शन है और सबसे कार्यकुशल भी है।
- तीसरा उभरता OS है माइक्रोसॉफ्ट विंडोज का जिसका विंडोज 7 वर्शन उतना चल नहीं पाया था, लेकिन हाल में ही लांच हुआ विंडोज 8 से काफी उम्मीदें बाँधी जा रहीं हैं।
- और भी कुछ OS बाज़ार में उपलब्ध हैं लेकिन उपभोक्ताओं ने उनको भाव नहीं दिया। जैसे ब्लैकबेरी और HP के OS.
2. स्क्रीन कैसा है?
स्क्रीन के साइज़ का सही होने भी एक महत्वपूर्ण घटक है। टेबलेट का स्क्रीन अमूमन 10 से 7 इंच के बीच तक होता है और यहाँ आपको यह निर्णयलेना होगा की आप इसको कैसे यूज़ करने की सोच रहे हो। 10इंच के टेबलेट को एक हाथ से इस्तेमाल करने असं नहीं होता है लेकिन गेम और विडियो के लिए यह उपयुक्त होता है। 7इंच का टेबलेट लाने ले जाने में इजी होता है लेकिन इसकी भी सीमायें हैं। आपकी जरूरतों के हिसाब से चुना गया स्क्रीन साइज़ ही सबसे अच्छी सलाह होगी।
स्क्रीन रेजोल्यूशन जानना भी ज़रूरी है, क्यूंकि अगर आप पैसे खर्च कर रहे हैं तो आपका आमूलचूल अनुभव भी अच्छा होना चाहिए। गूगल नेक्सस का स्क्रीन रेजोल्यूशन 2,560x1600 पिक्सेल्स के साथ अभी सबसे अच्छा है। इसके तुरंत बाद आता है iPad जिसका स्क्रीन रेजोल्यूशन है 2,048,x1,536 पिक्सेल्स। यहाँ समझाना यह है के उपरोक्त गुणात्मक संख्याएं जितनी ज्यादा होंगी स्क्रीन उतना ही अच्छा होगा। रंग ज्यादा निखर कर आयंगे और चीज़ें सजीव जान पड़ेंगी। हाँ इससे बैटरी की खपत बढ़ सकती है।
3. प्रोसेसर?

एप्पल हालाँकि अपना लेटेस्ट A5 चिप इस्तेमाल करता है। और एंड्राइड Nvidia Tegra प्रोसेसर इस्तेमाल करता है।
अंदरूनी तकनीक की अगर बात हो रही है तो RAM (रैपिड एक्सेस मेमोरी) जो मदद करता है सूचनाओं को इकठ्ठा करने और उन्हें आपके सामने प्रस्तुत करने में इसके बारे में पूछताछ करें।
512 MB से कम कुछ भी न लें चाहे कीमत कितनी ही कम हो और विज्ञापन कोई भी दावा क्यूँ न करे। 1GB RAM पे आपको अपने काम सुचारू रूप से करने में काफी मदद मिलती है। ध्यान रखें DDR 3 RAM हो तो और भी बढ़िया।
4. कनेक्टिविटी?
लगभग सारे टेबलेट्स Wi-Fi सपोर्ट करते हैं जो आपको इजी कनेक्टिविटी की सुविधा देता है। अपने देश में wi- fi हॉट स्पॉट की बेहद कमी है और ऐसा टेबलेट लेना जो केवल wi-fi से चले बुधिमानी नहीं समझी जाएगी।
गूगल का नेक्सस और iPad के कुछ वर्शन भी ऐसे ही टेबलेट हैं जो सिर्फ और सिर्फ Wi-Fi से चलाये जा सकते हैं। आप खरीदने से पहले इसकी जांच परख ज़रूर करें।
3G सिम या डाटा कार्ड से चलने वाले टेबलेट भी बहुतायत से मिलते हैं और भारतीय परिस्थितियों की बात करें तो यह विकल्प बेहतर प्रतीत होता है।
5. बैटरी, कैमरा और स्टोरेज
स्टोरेज की अगर बात करें तो 32GB आज टेबलेट्स और स्मार्ट फोंस का स्टैण्डर्ड स्टोरेज कैपेसिटी है। इससे बढ़ाना हो तो आपको एक्सटर्नल हार्ड डिस्क लेना पड़ेगा 4-5 हज़ार की चपत बैठे बैठे लग सकती है। 'अपनी जरूरतों को समझाना और उसी हिसाब से खर्च करना' जैसी पुरानी हो चुकी कहावत एक बार पुनः जीवीत हो जाती है।
निर्माता के दावों पर कतई न जायें कोई भी अपनी दही को खट्टा नहीं कहने वाला! जो उपभोक्ता हैं उनसे जाने के भाई बैटरी कितना देती है। दस घंटे के बैटरी लाइफ का ढिंढोरा पीटने वाले निर्माताओं की कमी नहीं है। पता तब लगता है जब ढाई घंटे में टेबलेट रोने लग जाता है।
विडियो कालिंग के लिए दो कैमरों का होना आवश्यक है यहाँ सिर्फ 3G नहीं बल्कि यह जानना भी लाजिमी है के इन्टरनेट से अगर विडियो कालिंग करने जाएँ तो भी दो कैमरे लगते हैं।
4MP या उससे थोड़े ज्यादा के कैमरा हमारी रोज़मर्रा की जरूरतों के लिए काफी होते हैं। मेगापिक्सेल के पीछे जाना चतुराई नहीं है।
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